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गुजरात हाईकोर्ट ने 2002 वडोदरा मॉब हत्या मामले में बरी होने का फैसला बरकरार रखा

हाईकोर्ट ने कहा कि भीड़ में शामिल किसी व्यक्ति विशेष की पहचान न हो पाने के कारण अभियोजन पक्ष आरोप साबित नहीं कर सका।

विद्रोही आनंद डेस्क

गुजरात हाईकोर्ट ने 2 मई को वर्ष 2002 के गोधरा कांड के बाद वडोदरा में हुई एक मॉब हत्या के मामले में पांच आरोपियों को बरी किए जाने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। न्यायमूर्ति निर्झर एस. देसाई और न्यायमूर्ति डी.एन. राय की खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी।

यह मामला 28 फरवरी 2002 का है, जब गोधरा ट्रेन कांड के अगले दिन बुलाए गए बंद के दौरान वडोदरा के खोड़ियारनगर इलाके में एक भीड़ ने समसुद्दीन उर्फ कासमखान नाम के व्यक्ति पर हमला कर उसकी हत्या कर दी थी।

वर्ष 2003 में सत्र न्यायालय ने राजू भरवाड़, प्रकाश शर्मा, करसन ड्राइवर, टीनो ठक्कर और फिलिपभाई मगलभाई मिस्त्री सहित पांचों आरोपियों को हत्या और दंगे से जुड़ी धाराओं में सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था। राज्य सरकार ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिस पर सुनवाई पूरी होने में करीब दो दशक का समय लगा।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि गवाह घटना में शामिल किसी खास व्यक्ति की पहचान नहीं कर सके, क्योंकि यह घटना रात के समय करीब 400 से 500 लोगों की भीड़ द्वारा अंजाम दी गई थी। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ संदेह से परे अपराध साबित करने में नाकाम रहा।

अदालत ने यह भी दर्ज किया कि मृतक की पत्नी सहित कई चश्मदीद गवाह भी हमले में शामिल विशिष्ट लोगों के नाम या पहचान नहीं बता सके थे। इस तरह की पहचान से जुड़ी दिक्कतें 2002 के दंगों से संबंधित कई अन्य मामलों में भी सामने आती रही हैं, जहां बड़ी भीड़ में शामिल व्यक्तियों की शिनाख्त अभियोजन पक्ष के लिए लगातार चुनौती बनी रही है।

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