सुप्रीम कोर्ट: यूएपीए मामलों में भी 'जमानत नियम, जेल अपवाद' का सिद्धांत लागू
अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 से मिलने वाला यह सिद्धांत यूएपीए के प्रावधानों से खारिज नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत दर्ज मामलों में जमानत से जुड़े एक अहम कानूनी सवाल पर मई में स्पष्टता दी। सैयद इफ्तिखार अंद्राबी बनाम राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) मामले में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने अपना फैसला सुनाया।
पीठ ने कहा कि "जमानत नियम है और जेल अपवाद" का सिद्धांत संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से निकलता है, और इसे यूएपीए की धारा 43-डी (5) जैसे कानूनी प्रावधान के ज़रिये पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि छोटी पीठें बड़ी पीठ के फैसलों को बिना स्पष्ट असहमति दर्ज किए दरकिनार नहीं कर सकतीं। इस संदर्भ में पीठ ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के.ए. नजीब मामले में तीन जजों की पीठ के फैसले को बाध्यकारी नज़ीर बताते हुए दोहराया।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला यूएपीए जैसे सख्त कानूनों के तहत लंबे समय से जेल में बंद विचाराधीन कैदियों की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करने वाली निचली और उच्च अदालतों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु बन सकता है। इससे पहले भी कई मामलों में लंबी पूर्व-विचारण हिरासत को लेकर अदालतों की चिंता सामने आती रही है।
सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों के बाद कानूनी बिरादरी में इस बात पर चर्चा शुरू हो गई है कि क्या इससे यूएपीए से जुड़े मामलों में जमानत को लेकर अदालतों का रुख आने वाले समय में अधिक उदार होगा, हालांकि विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि हर मामले का फैसला उसकी अपनी परिस्थितियों के आधार पर ही होगा।