इजरायल में आम चुनाव के लिए मतदान संपन्न: प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक साख दांव पर, क्या थमेगा राजनीतिक संकट?
हमास के साथ युद्ध और सुरक्षा चुनौतियों के साए में इजरायल की जनता ने 120 सीटों वाली नेसेट के लिए डाले वोट, शुरुआती रुझानों और त्रिशंकु संसद के आसार पर टिकी दुनिया की निगाहें

प्रस्तावना: इजरायल के इतिहास का सबसे अहम और संवेदनशील चुनाव
मध्य पूर्व के भू-राजनीतिक केंद्र बिंदु इजरायल में इन दिनों सियासी पारा अपने चरम पर है। देश की संसद यानी 'नेसेट' (Knesset) की सभी 120 सीटों के लिए आम चुनाव के तहत मतदान प्रक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न हो चुकी है। यह चुनाव इजरायल के आधुनिक राजनीतिक इतिहास के सबसे अहम चुनावों में से एक माना जा रहा है, क्योंकि यह देश एक ऐसे दौर में वोटिंग कर रहा है जब आंतरिक सुरक्षा, क्षेत्रीय संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय दबाव अपने चरम पर हैं।
देश के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) के लिए यह चुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन चुनावों के नतीजे न केवल नेतन्याहू के राजनीतिक करियर की दिशा तय करेंगे, बल्कि इजरायल की भावी विदेश नीति और सुरक्षा तंत्र पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा।
मतदान की प्रक्रिया और सुरक्षा के कड़े इंतजाम
इजरायल भर में फैले मतदान केंद्रों पर सुबह से ही मतदाताओं की लंबी कतारें देखी गईं। स्थानीय समयानुसार सुबह 7 बजे से शुरू हुआ मतदान रात 10 बजे तक चला। चुनाव आयोग और सुरक्षा एजेंसियों ने किसी भी अप्रिय घटना से निपटने के लिए चप्पे-चप्पे पर भारी सुरक्षा बलों की तैनाती की थी।
उल्लेखनीय है कि कूटनीतिक मिशनों और विदेशों में रहने वाले इजरायली नागरिकों के लिए मतदान पहले ही संपन्न हो चुका था, जहाँ रिकॉर्ड मतदान प्रतिशत दर्ज किया गया था। देश के भीतर भी मतदाताओं में खासा उत्साह देखा गया, जो इस बात का प्रमाण है कि इजरायली नागरिक अपने देश के राजनीतिक भविष्य को लेकर कितने जागरूक और चिंतित हैं।
बेंजामिन नेतन्याहू के सामने अस्तित्व की राजनीतिक लड़ाई
प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाला दक्षिणपंथी गठबंधन और उनकी पार्टी लिकुड (Likud) इस चुनाव में कड़ी चुनौती का सामना कर रही है। पिछले कुछ वर्षों में इजरायल की राजनीति में भारी उथल-पुथल देखने को मिली है। न्यायपालिका सुधारों को लेकर हुए देशव्यापी प्रदर्शन, देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था में कमियों के सवाल और गठबंधन सरकारों के अस्थिर समीकरणों के बीच नेतन्याहू लगातार सत्ता बचाने की जुगत में लगे रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह चुनाव सीधे तौर पर 'नेतन्याहू बनाम विपक्ष' बन चुका है। उनके विरोधी उन पर देश को विभाजित करने और व्यक्तिगत राजनीतिक लाभ के लिए नीतियों को मोड़ने का आरोप लगाते रहे हैं, जबकि नेतन्याहू खुद को इजरायल की सुरक्षा के एकमात्र भरोसेमंद प्रणेता के रूप में पेश करते आए हैं।
चुनावी समीकरण: 61 सीटों का जादुई आंकड़ा और त्रिशंकु संसद के आसार
इजरायल की आनुपातिक चुनावी प्रणाली (Proportional Representation System) के तहत किसी भी एक पार्टी के लिए अकेले बहुमत हासिल करना लगभग असंभव माना जाता है। नेसेट की 120 सीटों में से सरकार बनाने के लिए किसी भी गठबंधन को कम से कम 61 सीटों के जादुई आंकड़े को छूना अनिवार्य होता है।
ओपिनियन पोल और शुरुआती विश्लेषणों के संकेत बताते हैं कि मुकाबला बेहद कांटे का है और कोई भी एक स्पष्ट ब्लॉक आसानी से बहुमत के आंकड़े तक पहुंचता नजर नहीं आ रहा है:
नेतन्याहू का दक्षिणपंथी और धार्मिक ब्लॉक: प्रधानमंत्री नेतन्याहू को बचाने और उनके समर्थन में खड़े धड़े को रूढ़िवादी और कट्टरपंथी दलों का साथ मिल रहा है, हालांकि सीटों का गणित उनके लिए भी आसान नहीं है।
विपक्षी और मध्यममार्गी दल: पूर्व सैन्य अधिकारियों और बदलाव चाहने वाले दलों का एंटी-नेतन्याहू ब्लॉक भी सत्ता की कुर्सी हासिल करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है।
ऐसी स्थिति में यदि कोई भी स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर पाता है, तो इजरायल एक बार फिर जटिल और लंबी गठबंधन वार्ताओं के दौर में प्रवेश कर सकता है, या फिर देश को अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है।
प्रमुख मुद्दे जिन्होंने मतदाताओं को किया प्रभावित
इस बार के चुनाव में कई ऐसे ज्वलंत मुद्दे रहे जिन्होंने मतदाताओं के मन को गहराई से प्रभावित किया:
सुरक्षा और रक्षा नीति: देश की सीमाओं की सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ रक्षात्मक व आक्रामक रुख सबसे ऊपर रहा। मतदाताओं ने यह परखा कि कौन सा नेता उन्हें सबसे सुरक्षित रख सकता है।
आर्थिक दबाव और महंगाई: युद्ध और संघर्ष के लंबे दौर के कारण इजरायली अर्थव्यवस्था पर भी भारी दबाव पड़ा है। जीवनयापन की बढ़ती लागत और महंगाई आम जनता के लिए बड़ा मुद्दा रही।
बंधक संकट और क्षेत्रीय कूटनीति: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ रहे अलगाव और कूटनीतिक वार्ताओं को लेकर भी जनता बंटी हुई नजर आई।
गठबंधन की अनिश्चितताएं और आगे की राह
चूंकि ओपिनियन पोल और चुनावी विश्लेषक किसी एक दल की स्पष्ट जीत का दावा नहीं कर रहे हैं, इसलिए चुनाव के बाद के समीकरण बेहद महत्वपूर्ण हो गए हैं:
क्या नेतन्याहू छोटे और धुर-दक्षिणपंथी दलों को एकजुट कर दोबारा सरकार बना पाएंगे?
क्या विपक्ष मिलकर एक वैकल्पिक और स्थिर सरकार देने में सफल होगा?
क्या रोटेशनल गवर्नमेंट (रोटेशनल प्रधानमंत्री पद) जैसी व्यवस्थाओं का सहारा लेना पड़ेगा?
इन सभी सवालों के जवाब आधिकारिक परिणामों की घोषणा के बाद ही सामने आएंगे। निर्वाचन आयोग तय समयसीमा के तहत मतों की गिनती पूरी कर औपचारिक परिणामों की पुष्टि करेगा। इसके बाद देश के राष्ट्रपति सबसे मजबूत स्थिति वाले दल या नेता को सरकार बनाने का न्योता देंगे।
निष्कर्ष (Conclusion)
इजरायल में आम चुनाव के लिए मतदान संपन्न होने के साथ ही अब पूरी दुनिया की नजरें मतपेटियों और परिणामों पर टिक गई हैं। बेंजामिन नेतन्याहू का राजनीतिक सफर इस मोड़ पर आकर एक निर्णायक मुकाम पर खड़ा है। परिणाम चाहे जो भी हों, यह चुनाव इजरायल के आंतरिक लोकतंत्र, सामाजिक ताने-बाने और भविष्य की दिशा तय करने में मील का पत्थर साबित होगा। यदि राजनीतिक दल एक स्थिर सरकार देने में विफल रहते हैं, तो देश को एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता के भंवर में फंसना पड़ सकता है।




राष्ट्रीय से संबंधित

चुनाव आयोग के कामकाज पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: 'हम सब जानते हैं, समीक्षा करेंगे' - शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ताओं को 10 दिन का दिया समय

चक्रवात 'अर्नब' का तांडव शुरू: आंध्र प्रदेश और ओडिशा में भारी बारिश का रेड अलर्ट, 150 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से टकराएगा तूफान

राहुल गांधी मानहानि मामले में अदालत से बड़ी राहत, बरी होने के बाद प्रियंका गांधी बोलीं- "अंततः सत्य की ही जीत हुई"





