चुनाव आयोग के कामकाज पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: 'हम सब जानते हैं, समीक्षा करेंगे' - शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ताओं को 10 दिन का दिया समय
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस, ECI ने शपथ पत्र दाखिल कर सभी आरोपों को बताया बेबुनियाद।

प्रस्तावना: भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं पर सुप्रीम कोर्ट की नजर
भारत में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव प्रक्रिया को लोकतांत्रिक ढांचे की रीढ़ माना जाता है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत भारतीय चुनाव आयोग (Election Commission of India - ECI) को देश में पारदर्शी और सुचारू चुनाव कराने का सर्वाधिकार प्राप्त है। हालांकि, हाल के समय में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय लेने की प्रक्रिया (Internal Decision Making Process) पर कई तरह के सवाल खड़े किए गए हैं।
इन विवादों और विपक्षी दलों तथा याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिकाओं की पृष्ठभूमि में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) में चुनाव आयोग के कामकाज और उसके मुख्य चुनाव आयुक्त के अधिकारों की सीमा को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील सुनवाई आयोजित की गई। भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त और स्पष्ट टिप्पणी: "हम सब जानते हैं, हम समीक्षा करेंगे"
सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ताओं और विपक्षी गठबंधन (INDIA Bloc) के वकीलों ने चुनाव आयोग द्वारा स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR), फॉर्म 6 में कथित बदलाव और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर गंभीर सवाल उठाए, तो सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने बेहद संयमित लेकिन कड़ा रुख अपनाया।
चीफ जस्टिस ने मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए स्पष्ट रूप से कहा— "हम सब कुछ जानते हैं और हम इस पूरे मामले की गहन समीक्षा करेंगे।"
अदालत की इस टिप्पणी से यह साफ हो गया है कि न्यायपालिका संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और पारदर्शिता को लेकर किसी भी स्तर पर समझौता करने के मूड में नहीं है। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को चुनाव आयोग (ECI) द्वारा दाखिल किए गए हलफनामे (Counter-Affidavit) का अध्ययन करने और उसका जवाब देने के लिए 10 दिनों का समय दिया है। इस मामले में अगली विस्तृत सुनवाई के लिए 17 नवंबर की तिथि निर्धारित की गई है।
याचिकाकर्ताओं के मुख्य आरोप और वकील मेनका गुरुस्वामी की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट में दायर विभिन्न याचिकाओं में (जिसमें तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद डोला सेन और मुख्य याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की याचिकाएं शामिल हैं) आयोग के कामकाज के तरीकों पर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं:
मुख्य चुनाव आयुक्त के एकतरफा फैसले: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि आयोग एक तीन सदस्यीय निकाय है, लेकिन कई प्रशासनिक आदेश और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े निर्णय अन्य दो चुनाव आयुक्तों को दरकिनार करके मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा एकतरफा (Unilateral Decisions) लिए गए।
फॉर्म 6 में अवैध संशोधन का दावा: टीएमसी की तरफ से पेश सीनियर एडवोकेट डॉ. मेनका गुरुस्वामी ने अदालत के समक्ष दावा किया कि ECI ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने से जुड़े फॉर्म 6 (Form 6) के साथ छेड़छाड़ की और भ्रामक प्रेस विज्ञप्ति जारी की।
फाइलों और नोटिंग्स के संरक्षण की मांग: याचिकाकर्ताओं ने अदालत से गुहार लगाई कि चुनाव आयोग से जुड़ी आंतरिक फाइलों, आदेशों और नोटिंग्स को तुरंत सुरक्षित (Preserve) रखने के निर्देश दिए जाएं।
आयोग की जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न: याचिकाओं में यह भी मांग की गई है कि आयोग की निर्णय लेने की प्रक्रिया के लिए एक स्वतंत्र जांच बैठाई जाए, ताकि जनता में संस्था की साख बनी रहे।
चुनाव आयोग (ECI) का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा: सभी आरोप खारिज
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से ठीक पहले चुनाव आयोग ने अदालत में एक विस्तृत जवाबी हलफनामा (Counter-Affidavit) दाखिल किया, जिसमें उसने याचिकाकर्ताओं के सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया। ECI का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह ने इन आरोपों को बाहर फैलाने वाला "अनावश्यक बवंडर" (Rhetoric) करार दिया।
ECI के हलफनामे की प्रमुख बातें:
सभी फैसले सर्वसम्मति से हुए: चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में स्पष्ट किया है कि 2025-26 के दौरान स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और अन्य प्रशासनिक मामलों पर लिए गए सभी निर्णय तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति (Unanimous) से हुए हैं और उनमें कानूनी वैधता पूरी है।
निर्णय प्रक्रिया की प्रणाली: आयोग ने समझाया कि फाइलें पहले एक चुनाव आयुक्त, फिर दूसरे चुनाव आयुक्त और अंत में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के पास जाती हैं। रिकॉर्डेड फाइलों और बैठकों के जरिए ही अंतिम निर्णय तय होते हैं।
फॉर्म 6 में बदलाव का खंडन: आयोग ने किसी भी अनधिकृत बदलाव की बात से इनकार करते हुए कहा कि केवल ऑनलाइन फॉर्म को और स्पष्ट करने के उद्देश्य से व्यवस्थित किया गया था, जिससे मतदाता नामांकन की प्रक्रिया सुगम हो सके।
CEC को हटाने या काम रोकने की मांग अनुचित: आयोग ने संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जो सुप्रीम कोर्ट के जज के लिए निर्धारित है। अतः कार्य से रोकने (Restraining) की मांग कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है।
राजनीतिक गलियारों में मची हलचल और INDIA ब्लॉक का रुख
सर्वोच्च अदालत में चल रही इस कानूनी लड़ाई ने देश के राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है। विपक्षी दलों के गठबंधन 'इंडिया' (INDIA Bloc) ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संवैधानिक संस्था का निष्पक्ष रहना अनिवार्य है। कांग्रेस, टीएमसी और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि मतदाता सूचियों में संशोधन या SIR की प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता होनी चाहिए, ताकि किसी भी पात्र नागरिक का नाम मनमाने ढंग से न काटा जा सके।
दूसरी ओर, सत्तारूढ़ दल और सरकार का मानना है कि विपक्ष केवल चुनाव आयोग जैसी गरिमामयी संस्था की साख को धूमिल करने के उद्देश्य से निराधार आरोप लगा रहा है। ECI अपनी संवैधानिक शक्तियों का पूरी निष्ठा और कानूनी दायरे में रहकर पालन कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में आगे क्या होगा? (17 नवंबर की सुनवाई)
मंगलवार को हुई सुनवाई के बाद पीठ ने किसी भी तरह का अंतरिम आदेश (Interim Order) जारी करने से फिलहाल इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि वह सभी पक्षों के लिखित दावों और प्रत्युत्तर (Rejoinder) को देखने के बाद ही कोई निर्णय लेगी।
अब सबकी नजरें 17 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं। 10 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता अपना प्रत्युत्तर हलफनामा दाखिल करेंगे, जिसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली में किसी न्यायिक हस्तक्षेप या स्वतंत्र दिशा-निर्देशों की आवश्यकता है या नहीं।
निष्कर्ष (Conclusion)
चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई केवल एक कानूनी विवाद नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही का बड़ा इम्तिहान है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कि वह हर पहलू की निष्पक्ष जांच करेगा, यह दर्शाती है कि देश में लोकतंत्र और संविधान की सर्वोच्चता कायम है। 17 नवंबर की तारीख भारतीय राजनीतिक और कानूनी परिदृश्य के लिए बेहद अहम साबित होने वाली है।




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