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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: जेलों में भीड़भाड़ घटाने के लिए खुली जेलों के विस्तार का आदेश

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने खुली जेलों के सुधार के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित करने का निर्देश दिया, जिसकी अगुवाई पूर्व जज रवींद्र भट करेंगे।

विद्रोही आनंद डेस्क

सुप्रीम कोर्ट ने 26 फरवरी को देश की जेलों में भीड़भाड़ की समस्या पर एक अहम फैसला सुनाते हुए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को खुली जेलों (ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशंस) के विस्तार और उनके संचालन को एकसमान बनाने के निर्देश दिए।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मानवाधिकार कार्यकर्ता सुहास चकमा की एक जनहित याचिका पर यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि देश की जेलें औसतन 120 प्रतिशत से अधिक क्षमता पर चल रही हैं, जबकि कुछ राज्यों में यह आंकड़ा 150 प्रतिशत से भी ऊपर है।

पीठ ने अपने आदेश में कहा कि खुली जेलें संविधान की उस भावना को साकार करती हैं जिसमें भरोसे, ज़िम्मेदारी और सीमित स्वतंत्रता को सुधार प्रक्रिया का अहम हिस्सा माना गया है। अदालत के मुताबिक बंद जेलों में लगातार बढ़ती भीड़भाड़ कैदियों के पुनर्वास और उनके समाज में दोबारा जुड़ने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है।

फैसले के तहत सुप्रीम कोर्ट ने खुली जेलों के सुधार और प्रशासन के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का भी आदेश दिया, जिसकी अध्यक्षता पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस रवींद्र भट करेंगे। यह समिति देशभर में खुली जेलों के संचालन के लिए एकसमान मानक तैयार करेगी और छह महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट अदालत में सौंपेगी।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि इस दिशा में हुई प्रगति की पहली अनुपालन रिपोर्ट 21 अगस्त 2026 तक संबंधित हाईकोर्ट के समक्ष पेश की जाए, ताकि राज्यों में हो रहे बदलावों की नियमित समीक्षा हो सके।

यह याचिका मूल रूप से जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों को रखे जाने और उससे जुड़ी मानवाधिकार चिंताओं को लेकर दायर की गई थी, जिस पर अदालत लंबे समय से सुनवाई कर रही थी।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला जेल सुधार और कैदियों के पुनर्वास से जुड़े दीर्घकालिक मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर नीति बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है, हालांकि इसके अमल की ज़िम्मेदारी काफी हद तक राज्य सरकारों पर निर्भर करेगी।

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